अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में H-1B visa के नियमों में बड़े बदलाव की घोषणा की है। इसके तहत अब H-1B वीजा के लिए कंपनियों को $100,000 की फीस देनी होगी। यह कदम ट्रंप के “America First” एजेंडा का हिस्सा है, जिसका मकसद अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा करना और विदेशी कर्मचारियों के दुरुपयोग को रोकना है।
यह बदलाव भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों के लिए चिंता का विषय बन गया है क्योंकि भारत H-1B वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी देश है। आइए विस्तार से समझते हैं कि H-1B visa में ये बदलाव क्या हैं और इसका असर भारतीयों, अमेरिकी और वैश्विक IT उद्योग पर कैसे पड़ सकता है।
H-1B Visa क्या है?

H-1B visa अमेरिका में उच्च कौशल वाले पेशेवरों के लिए जारी किया जाता है। यह वीजा उन लोगों को मिलता है जो अमेरिका में नौकरी करना चाहते हैं, खासकर टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में।
- वैधता: H-1B वीजा 6 साल के लिए होता है।
- परिवार: वीजा धारक अपनी पत्नी और बच्चों को भी अमेरिका ले जा सकता है।
- नागरिकता: H-1B धारक आगे जाकर अमेरिका की नागरिकता के लिए भी आवेदन कर सकते हैं।
भारत H-1B वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी देश है। पिछले कुछ वर्षों में 70% से अधिक H-1B वीजा भारतीयों को मिले हैं।
ट्रंप का “Project Firewall” और H-1B Visa
अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ लेबर ने Project Firewall लॉन्च किया है। इसका उद्देश्य है कि H-1B वीजा का दुरुपयोग न हो और अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित रहे।
Project Firewall के मुख्य बिंदु:
- कंपनियों की निगरानी: टेक कंपनियों और अन्य उद्योगों में H-1B कर्मचारियों की भर्ती की निगरानी की जाएगी।
- सख्त नियम: नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों को दंड का सामना करना पड़ेगा, जैसे बैक वेज रिफंड या H-1B प्रोग्राम से प्रतिबंध।
- लाभार्थियों पर असर: भारतीयों जैसे H-1B वीजा धारकों पर इसका सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि वे सबसे बड़े लाभार्थी हैं।
Project Firewall: H-1B Visa पर निगरानी
Project Firewall अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ लेबर की पहल है, जिसका मुख्य उद्देश्य H-1B वीजा के दुरुपयोग को रोकना और अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित करना है।
मुख्य बातें:
- विभाग H-1B प्रोग्राम का व्यक्तिगत निरीक्षण करेगा।
- उल्लंघन करने वाली कंपनियों को बैक वेज रिफंड, सिविल पेनल्टी, और H-1B प्रोग्राम से प्रतिबंध का सामना करना पड़ेगा।
- यह पहल तकनीकी कंपनियों और IT सेवा उद्योग के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
H-1B Visa फीस में बड़ा इजाफा
ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा के लिए फीस बढ़ाकर $100,000 प्रति वीजा कर दी है। इससे पहले H-1B वीजा की रजिस्ट्रेशन फीस $215 थी और पर्ची फाइलिंग के लिए $780 लिया जाता था।
इस बदलाव का असर:
- अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को रखना महंगा होगा।
- भारतीय आईटी पेशेवरों के अमेरिका जाने का खर्च बढ़ जाएगा।
- तकनीकी और इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है क्योंकि कंपनियों को बजट और संसाधनों को नए नियमों के अनुसार समायोजित करना होगा।
ट्रंप का मकसद: अमेरिकियों की नौकरी पहले
ट्रंप प्रशासन का उद्देश्य है कि अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित रहे। उन्होंने कहा है कि H-1B वीजा का दुरुपयोग रोकना आवश्यक है ताकि “अमेरिकी पहले” का एजेंडा पूरा हो सके।
- अमेरिकी टेक उद्योग में विदेशी कर्मचारियों की संख्या बढ़ गई है।
- अब कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि केवल अत्यधिक कुशल कर्मचारी ही H-1B वीजा के लिए अमेरिका आएं।
भारतीय पेशेवरों पर असर
भारतीय पेशेवर H-1B वीजा के सबसे बड़े लाभार्थी हैं।
- भारत ने पिछले साल H-1B वीजा का 71% हिस्सा हासिल किया।
- अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा जैसी कंपनियों ने हजारों भारतीयों को H-1B वीजा प्रदान किया।
- नई फीस के कारण भारतीयों के अमेरिका जाने की संभावना कम हो सकती है।
अमेरिकी और भारतीय IT कंपनियों के लिए असर
भारतीय कंपनियां जैसे:
- TCS (Tata Consultancy Services)
- Infosys
- Wipro
- HCLTech
- Cognizant
इन कंपनियों को H-1B कर्मचारियों की वजह से अमेरिकी प्रोजेक्ट्स में भारी भूमिका निभानी होती है। $100,000 फीस बढ़ने से इन कंपनियों के खर्च बढ़ेंगे और प्रोजेक्ट लागत प्रभावित होगी।
अमेरिकी कंपनियों जैसे:
- Amazon
- Microsoft
- Apple
- Meta
इन कंपनियों को भी अपने H-1B कर्मचारियों पर खर्च बढ़ाने पड़ सकते हैं। कंपनियां अब केवल उच्च स्तर के या अनुभवी कर्मचारियों को प्राथमिकता दे सकती हैं।
अमेरिकी नीति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
ट्रंप प्रशासन का मकसद अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरी सुनिश्चित करना और H-1B वीजा का दुरुपयोग रोकना है।
लेकिन इसका असर वैश्विक IT प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ सकता है।
- अमेरिकी कंपनियों को विदेशी विशेषज्ञों की कमी का सामना करना पड़ेगा।
- प्रोजेक्ट्स की देरी और नवाचार में कमी हो सकती है।
- भारत जैसे देशों को वैश्विक IT प्रतिभा के लिए बढ़त मिल सकती है।
H-1B Visa का भविष्य और संभावित बदलाव

- H-1B वीजा पर सख्ती से निगरानी बढ़ेगी।
- कंपनियों को नियमों का पालन सुनिश्चित करना होगा।
- भारतीय IT पेशेवरों के लिए नौकरी की संभावना पर असर पड़ेगा।
- अमेरिकी कर्मचारियों के लिए अवसर बढ़ेंगे।
H-1B Visa से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ
- महंगी फीस: $100,000 प्रति वीजा ने कंपनियों और कर्मचारियों दोनों पर दबाव डाला है।
- सख्त निगरानी: Project Firewall के तहत नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों को दंड।
- कौशल अंतर: अमेरिकी यूनिवर्सिटी पर्याप्त तकनीकी पेशेवर तैयार नहीं कर रही हैं, जिससे विशेषज्ञों की कमी हो सकती है।
- स्टार्टअप और छोटे व्यवसायों पर असर: नए नियम छोटे व्यवसायों के लिए चुनौतिपूर्ण होंगे।
निष्कर्ष
H-1B visa भारतीय पेशेवरों और IT कंपनियों के लिए अवसर और चुनौती दोनों लेकर आता है। ट्रंप प्रशासन के नए नियम और Project Firewall के कारण H-1B वीजा महंगा और सख्त हो गया है।
भारतीय पेशेवरों और कंपनियों को अब उच्च कौशल और अनुभव के आधार पर अमेरिका में अवसर तलाशने की रणनीति बनानी होगी। अमेरिकी कंपनियों को भी अपने प्रोजेक्ट्स और कर्मचारियों की भर्ती नीति में बदलाव करना पड़ेगा।
यह बदलाव निश्चित रूप से वैश्विक IT उद्योग पर असर डाल सकता है, लेकिन उच्च कौशल वाले पेशेवरों के लिए अवसर अभी भी मौजूद हैं।
प्रमुख सवाल और जवाब (FAQs)
Q1: H-1B Visa किसके लिए है?
A: यह अमेरिका में उच्च कौशल वाले पेशेवरों के लिए है।
Q2: नई फीस कब लागू होगी?
A: 21 सितंबर 2025 से $100,000 वार्षिक फीस लागू होगी।
Q3: भारतीय पेशेवरों पर इसका असर क्या होगा?
A: H-1B वीजा पर बढ़ी फीस और सख्त नियमों के कारण अमेरिका में नौकरी पाना मुश्किल हो सकता है।
Q4: अमेरिकी कंपनियों को क्या करना होगा?
A: कंपनियों को उच्च कौशल वाले कर्मचारियों की भर्ती सुनिश्चित करनी होगी और नए नियमों के अनुसार फीस चुकानी होगी।
Q5: Project Firewall क्या है?
A: यह अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ लेबर की पहल है, जिसका उद्देश्य H-1B वीजा के दुरुपयोग को रोकना और अमेरिकी कर्मचारियों की सुरक्षा करना है।
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